रविवार, 12 सितंबर 2010

* अनुनय *

प्रियतम हृदयपटल पर जबसे
मैंने की तव छवि निर्माण,
सुख से उछले पड़ते हैं ये
मेरे पागल हर्षित प्राण !

कभी प्रेम से कर मनुहारें
उसे मनाने को आते,
देकर 'निठुर' उपाधि कभी वे
उससे रूठ बैठ जाते !

मूर्ति तुम्हारी ही को प्रियतम
समझ रहे हैं वे निज देव,
कब तक यों छल करके उनसे
कहाँ छुपोगे तुम स्वयमेव !

इन भोले प्राणों के संग यह
बोलो नाथ कहाँ का न्याय,
हुए जर्जरित व्याकुलता से
अधिक न सह सकते अन्याय !

प्रियतम यदि वे दर्श तुम्हारा
शीघ्र यहाँ न पायेंगे,
तो जीवन का मोह छोड़ कर
पास तुम्हारे आयेंगे !


किरण

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना लगायी है
    आपने अपनी माता जी की!
    --
    पढ़कर आनन्द आ गया!

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  2. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना ( साकार बनो ओ निराकार ) 14 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

    जवाब देंहटाएं