रविवार, 4 अप्रैल 2010

परदेशी निर्मोही !

वह पंथी तो परदेशी है ,
कर पल्लव हिला-हिला उसको
क्यों व्यर्थ बुलाते हो पादप ,
क्यों स्नेह जताते हो पादप !

क्या जाने उसका कौन नगर ,
क्या जाने उसकी कौन डगर ,
क्या जाने कहाँ लुटायेगा
वह स्नेह सुधा प्याले भर-भर !
निर्मम होते हैं परदेशी
जग तो यह ही कहता आया
क्यों इसे भूलते हो पादप ,
क्यों नेह लुटाते हो पादप !

तेरी छाया में आ क्षण भर
मेटा श्रम, उर भर तृप्ति अमर ,
वह आज न जाने कहाँ पहुँच
फिर अपना नया बनाये घर !
झिलमिल स्वप्नों की संसृति में
तुम याद न आओगे उसको ,
क्यों समय गँवाते हो पादप ,
क्यों प्यार लुटाते हो पादप !

रोते तो कितने ही आते ,
क्षण भर रुक मौज मना जाते ,
जोड़ोगे कब तक किस-किस से
ऐसे रिश्ते ऐसे नाते !
यह दुनिया है आनी जानी
रुक सका न कोई चिरजीवन
क्यों मोह बढ़ाते हो पादप ,
क्यों प्रीत लुटाते हो पादप !

किरण

11 टिप्‍पणियां:

  1. रोते तो कितने ही आते ,
    क्षण भर रुक मौज मना जाते ,
    जोड़ोगे कब तक किस-किस से
    ऐसे रिश्ते ऐसे नाते !

    सुन्दर भाव की पंक्तियाँ।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  2. क्या जाने उसका कौन नगर ,
    क्या जाने उसकी कौन डगर ,
    क्या जाने कहाँ लुटायेगा
    वह स्नेह सुधा प्याले भर-भर !
    निर्मम होते हैं परदेशी
    जग तो यह ही कहता आया
    क्यों इसे भूलते हो पादप ,
    क्यों नेह लुटाते हो पादप !
    Sundar bhav,ek goodhta liye hue..!

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  3. एक सुंदर भाव भरी कविता |
    आशा

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  4. भावों से पूर्ण ....ये सुन्दर रचना .....अतिउत्तम

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  5. यह दुनिया है आनी जानी
    रुक सका न कोई चिरजीवन
    क्यों मोह बढ़ाते हो पादप ,
    क्यों प्रीत लुटाते हो पादप !
    Bahut sundar bhavpurn rachna
    Bahut shubhkamnayne

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  6. रोते तो कितने ही आते ,
    क्षण भर रुक मौज मना जाते ,
    जोड़ोगे कब तक किस-किस से
    ऐसे रिश्ते ऐसे नाते !
    यह दुनिया है आनी जानी
    रुक सका न कोई चिरजीवन .

    बहुत ही अनुपम .. लयबद्ध .... गुनगुनाने वाली रचना है .. भावों से परिपूर्ण ... लाजवाब रचना ...

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